
सक्ती जिले के सिंघीतराई स्थित वेदांता पावर प्लांट में 14 अप्रैल को दोपहर 2:33 बजे हुआ भीषण बॉयलर विस्फोट अब एक साधारण औद्योगिक हादसा नहीं, बल्कि लगातार चेतावनियों की अनदेखी, तकनीकी लापरवाही और उत्पादन बढ़ाने की अंधी दौड़ का परिणाम साबित हो रहा है।
इस हादसे में अब तक 20 मजदूरों की मौत हो चुकी है, जबकि 36 मजदूर झुलसे, जिनमें से 16 का इलाज रायगढ़ और रायपुर के अलग-अलग अस्पतालों में जारी है। मृतकों में छत्तीसगढ़ के साथ-साथ यूपी, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के मजदूर शामिल हैं।

औद्योगिक सुरक्षा विभाग के बॉयलर इंस्पेक्टर उज्ज्वल गुप्ता और उनकी टीम ने घटना के अगले दिन करीब 6 घंटे तक मौके की जांच की और शाम 8 बजे अपनी रिपोर्ट एसपी प्रफुल्ल ठाकुर को सौंपी। इस प्रारंभिक जांच में जो तथ्य सामने आए, वे सीधे तौर पर प्रबंधन की गंभीर लापरवाही की ओर इशारा करते हैं।
जांच में पाया गया कि 2028 टीपीएच क्षमता वाले वाटर ट्यूब बॉयलर में अचानक फर्नेस प्रेशर महज 1 से 2 सेकंड के भीतर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया। इतनी तेजी से दबाव बढ़ा कि सिस्टम को बंद करने का मौका ही नहीं मिला और सेफ्टी मैकेनिज्म भी काम नहीं कर पाया। अंदरूनी विस्फोट इतना तेज था कि उसकी चपेट में बाहरी पाइपलाइन भी आ गई।

जांच का सबसे अहम और चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि हादसे से ठीक पहले प्लांट में उत्पादन बढ़ाने के लिए बॉयलर का लोड बेहद तेजी से बढ़ाया गया। करीब एक घंटे के भीतर 350 मेगावाट से बढ़ाकर 590 मेगावाट तक लोड कर दिया गया। इतनी तेजी से लोड बढ़ाने के लिए हवा और ईंधन का बेहद सटीक संतुलन जरूरी होता है, लेकिन यही संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया। यही जल्दबाजी फर्नेस को ‘बम’ में बदलने की सबसे बड़ी वजह बनी।

तकनीकी रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि पीए (प्राइमरी एयर) फैन में बार-बार खराबी आ रही थी। सुबह करीब 10:30 बजे लॉगबुक में इसकी एंट्री तक दर्ज की गई थी, इसके बावजूद प्लांट का संचालन नहीं रोका गया। 3 से 4 घंटे के भीतर यह फैन तीन बार खराब हुआ, जिससे फर्नेस के अंदर हवा और ईंधन का संतुलन बिगड़ता गया और अधजला ईंधन यानी अनबर्न फ्यूल लगातार जमा होता रहा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, यही अनबर्न फ्यूल आगे चलकर विस्फोट की मुख्य वजह बना। जब यह जमा ईंधन अचानक जला, तो अत्यधिक दबाव पैदा हुआ, जिससे बॉटम रिंग हेडर के पाइप फट गए। जांच में साफ किया गया है कि पाइप फटना असली कारण नहीं, बल्कि उस दबाव का परिणाम था जो असंतुलित दहन के कारण बना।

जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि अत्यधिक दबाव के दौरान पाइपिंग सिस्टम और अन्य तकनीकी हिस्सों में फेलियर हुआ। सेफ्टी सिस्टम समय पर सक्रिय नहीं हो पाया और बैकअप सिस्टम भी प्रभावी साबित नहीं हुआ। यही वजह रही कि कुछ ही सेकंड में पूरा सिस्टम नियंत्रण से बाहर हो गया।
क्षमता से अधिक लोड पर चलाया गया
हादसे के बाद सामने आए मजदूरों के बयान इस त्रासदी की भयावहता और व्यवस्थागत लापरवाही को और उजागर करते हैं। झारखंड से काम करने आए फिटर इंदर देव राणा ने बताया कि सबसे बड़ी समस्या इंजीनियरिंग स्तर पर थी। उनके अनुसार प्लांट को उसकी क्षमता से ज्यादा लोड पर चलाया जा रहा था। उन्होंने कहा कि पहले से ही गर्मी ज्यादा थी, ऐसे में ओवरलोड पर प्लांट चलाना खतरनाक था, लेकिन इसके बावजूद उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की गई।

ना सायरन बजा, ना अलर्ट जारी हुआ, एंबुलेंस भी नही मिली
पश्चिम बंगाल से आए फिटर सुमित कोले, जो पिछले एक साल से प्लांट में काम कर रहे हैं, ने बताया कि धमाके के वक्त पूरा इलाका धूल और धुएं से भर गया था, लेकिन इसके बावजूद प्लांट के अंदर कोई सायरन नहीं बजा और न ही कोई अलर्ट जारी किया गया। उन्होंने बताया कि सिर्फ एक जोरदार धमाका हुआ और देखते ही देखते सब कुछ खत्म हो गया। सबसे गंभीर बात उन्होंने यह बताई कि मौके पर एंबुलेंस तक उपलब्ध नहीं थी और घायलों को बसों में लादकर अस्पताल भेजना पड़ा।
पहले भी हुआ था गैस लीक
बिहार के गोपालगंज निवासी राम आश्रय सिंह, जो प्लांट में रिगर का काम करते हैं, ने बताया कि वे 2024 से यहां काम कर रहे हैं और पिछले साल टेस्टिंग के दौरान भी एक बार पाइप फटने से गैस लीक हुई थी। उस समय कंपनी ने पहले से सूचना दी थी, जिससे कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन इस बार प्रोडक्शन के दौरान अचानक सब कुछ हुआ और किसी को संभलने का मौका नहीं मिला।

धमाके के बाद मची अफरा-तफरी
हादसे के समय मौजूद एक अन्य मजदूर विजय ने बताया कि करीब डेढ़ बजे वे लंच करके बाहर निकले ही थे कि अचानक बॉयलर से तेज धुआं उठने लगा और आसपास खड़े मजदूर सुपरहीटेड स्टीम की चपेट में आ गए। लोग चीखते हुए भाग रहे थे और जो जहां तक भाग सका, भाग गया।
उन्होंने बताया कि वे करीब 200 मीटर दूर थे और तुरंत बचाव के लिए दौड़े। वहीं प्लांट के ही एक अन्य वर्कर राजा आलम ने बताया कि उनकी नाइट ड्यूटी थी और वे करीब 500 मीटर दूर कमरे में थे। अचानक जोरदार धमाके की आवाज आई, जिसके बाद वे बाहर निकले और अफरा-तफरी का माहौल देखा।

सुपरहीटेड स्टीम की चपेट में आए मजदूर
विशेषज्ञों के अनुसार, बॉयलर से निकली भाप 500 से 600 डिग्री सेल्सियस तक गर्म होती है और बहुत तेज गति से बाहर निकलती है। इससे शरीर की त्वचा तुरंत जल जाती है और सांस के जरिए अंदर जाने पर फेफड़े तक प्रभावित हो जाते हैं। यही वजह है कि कई मजदूर धमाके से नहीं, बल्कि इस सुपरहीटेड स्टीम की चपेट में आने से मारे गए।
20 दिन पहले हुई थी शादी, हाथों की मेहंदी तक नहीं छूटी
इस हादसे में कई दिल दहला देने वाली मानवीय कहानियां भी सामने आई हैं। झारखंड के अब्दुल करीम की शादी महज 20 दिन पहले ही हुई थी और वे काम पर लौटे थे। उनके हाथों की मेहंदी तक नहीं छूटी थी। बिहार के आकिब खान भी 13 अप्रैल को ही काम पर लौटे थे, लेकिन अगले ही दिन इस हादसे में उनकी जान चली गई।

मजदूरों ने कहा – असुरक्षित महसूस कर रहे
घटना के बाद मजदूरों में भारी दहशत फैल गई और प्लांट के पीछे स्थित लेबर क्वार्टर में रहने वाले करीब 2000 मजदूर काम छोड़कर अपने-अपने घर लौट गए। अब वहां मुश्किल से 50 मजदूर ही बचे हैं। मजदूरों ने यह भी आरोप लगाया कि हादसे के बाद उनकी सुरक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं किया गया और वे खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
हाल ही में हुए थे दो हादसे, फिर भी सुधार नहीं
हादसे से पहले प्लांट प्रबंधन की ओर से किए गए आंतरिक संचार भी कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। SNN24 के हाथ लगे एक व्हाट्सऐप चैट के मुताबिक, 27 मार्च 2026 से प्लांट यूनिट को एक सप्ताह के लिए शटडाउन करने का नोटिफिकेशन जारी किया गया था। इस मैसेज में साफ तौर पर लिखा गया था कि इस दौरान मेंटेनेंस और अन्य कार्य किए जाएंगे तथा कर्मचारियों को निर्धारित शेड्यूल के अनुसार काम करना होगा।

इसके बाद एक अन्य मैसेज में 23 मार्च को “टूल बॉक्स टॉक (TBT)” सेफ्टी अवेयरनेस मीटिंग आयोजित करने की जानकारी दी गई थी, जिसमें हाल ही में हुए दो हादसों की समीक्षा कर कर्मचारियों को सुरक्षा संबंधी जरूरी निर्देश दिए जाने थे। यानी प्रबंधन को पहले से ही जोखिम और तकनीकी खामियों की जानकारी थी, इसके बावजूद हादसे के कुछ ही दिनों बाद इतनी बड़ी दुर्घटना हो जाना सीधे तौर पर सुरक्षा तैयारियों और सुधारात्मक कदमों की विफलता को दर्शाता है।
अफसर बोले – लीकेज की वजह से हुआ ब्लास्ट
हादसे को लेकर प्लांट के कुछ अधिकारियों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि यह विस्फोट बॉयलर यूनिट से टर्बाइन तक भाप ले जाने वाली पाइपलाइन में लीकेज के कारण हुआ। उनके मुताबिक, इस पाइप के जरिए हाई प्रेशर स्टीम टर्बाइन तक पहुंचती है, जिससे बिजली उत्पादन होता है।
लीकेज के चलते सिस्टम में असामान्य दबाव बना और अंततः विस्फोट हुआ। हालांकि शुरुआती जांच में अनबर्न फ्यूल और ओवरलोडिंग को भी प्रमुख कारण माना गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हादसा कई तकनीकी खामियों के एक साथ सामने आने का परिणाम था।
प्लांट मालिक और हेड सहित 19 लोगों पर FIR दर्ज
इस पूरे मामले में पुलिस ने सख्त कार्रवाई करते हुए डभरा थाने में FIR दर्ज की है। एसपी प्रफुल्ल ठाकुर ने बताया कि कंपनी प्रबंधन सहित 8 से 10 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है, जिनमें वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल और प्लांट हेड देवेंद्र पटेल के नाम भी शामिल हैं।

वही सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस मामले मे कुल 19 लोगों के खिलाफ अपराध दर्ज हुआ है। मामला मेंटेनेंस, संचालन और सुरक्षा में लापरवाही से जुड़ा हुआ है।
कलेक्टर ने मजिस्ट्रियल जांच के दिए आदेश
कलेक्टर अमृत विकास टोपनो ने मामले की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं और 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट मांगी गई है। वहीं छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने भी 10 सदस्यीय जांच समिति गठित की है, जो घटनास्थल का निरीक्षण कर अपनी रिपोर्ट देगी।
रोजी-रोटी पर पड़ा असर
हादसे के बाद प्लांट बंद होने से मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। दूर-दराज राज्यों से आए मजदूरों ने बताया कि वे 25 से 30 हजार रुपए महीने की मजदूरी के लिए यहां काम करने आते थे, लेकिन अब प्लांट बंद होने से उनकी आय पूरी तरह रुक गई है।

अधिकांश मजदूर डर और असुरक्षा के कारण अपने घर लौट चुके हैं। जो करीब 50 मजदूर अभी भी वहां रुके हैं, उनके सामने भी यह सवाल है कि उन्हें वेतन मिलेगा या नहीं। मजदूरों का कहना है कि जब काम ही नहीं है, तो यहां रुककर क्या करेंगे, इसलिए वे भी घर लौटने की तैयारी में हैं।
केंद्र सरकार, राज्य सरकार और प्लांट प्रबंधन ने की मुआवजे की घोषणा
मुआवजे की घोषणा भी की गई है, जिसमें कंपनी ने मृतकों के परिजनों को 35 लाख रुपए और एक सदस्य को नौकरी देने का ऐलान किया है, जबकि घायलों को 15 लाख रुपए दिए जाएंगे।

राज्य सरकार ने मृतकों को 5 लाख और घायलों को 50 हजार रुपए, वहीं प्रधानमंत्री राहत कोष से मृतकों को 2 लाख और घायलों को 50 हजार रुपए देने की घोषणा की गई है। हालांकि विपक्ष ने इसे अपर्याप्त बताते हुए मृतकों के परिजनों को 1 करोड़ रुपए मुआवजा देने की मांग की है।

सुरक्षा को लेकर खड़े हो रहे सवाल
पूरी घटना यह सवाल खड़ा करती है कि जब सुबह से ही सिस्टम में खराबी के संकेत मिल रहे थे, तो प्लांट को रोका क्यों नहीं गया? क्या मुनाफे और उत्पादन बढ़ाने के दबाव में सुरक्षा मानकों को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया? क्यों सेफ्टी सिस्टम और बैकअप समय पर काम नहीं कर पाए?
प्लांट प्रबंधन की घोर लापरवाही
प्रारंभिक जांच, तकनीकी विश्लेषण और मजदूरों के बयान एक ही निष्कर्ष की ओर इशारा करते हैं कि यह हादसा टाला जा सकता था। लेकिन लापरवाही, जल्दबाजी और खराब प्रबंधन ने मिलकर इसे एक ऐसी त्रासदी में बदल दिया, जिसने कुछ ही सेकंड में 20 जिंदगियां छीन लीं।
जानें वेदांता पावर प्लांट के बारे में
सक्ती जिले के सिंघीतराई में स्थित यह वेदांता पावर प्लांट कुल 1200 मेगावाट क्षमता का कोयला आधारित थर्मल पावर प्रोजेक्ट है, जिसमें 600-600 मेगावाट की दो यूनिट शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट का निर्माण वर्ष 2009 में शुरू हुआ था और यह पहले एथेना छत्तीसगढ़ पावर लिमिटेड के पास था। वर्ष 2016 से 2022 के बीच इसका काम लंबे समय तक बंद रहा, जिसके बाद 2022 में वेदांता लिमिटेड ने इसे अधिग्रहित किया।

अधिग्रहण के बाद निर्माण और विकास कार्य दोबारा शुरू हुआ और पहली यूनिट (600 मेगावाट) अगस्त 2025 से चालू होकर बिजली उत्पादन कर रही है। दूसरी यूनिट का निर्माण अभी जारी है और इसके दिसंबर 2026 या जनवरी 2027 तक शुरू होने की संभावना जताई जा रही है। जानकारी के मुताबिक, यह यूनिट पहले भी कई बार मेंटेनेंस के कारण बंद हो चुकी है और हाल ही में मार्च 2026 में भी इसे कुछ दिनों के लिए शटडाउन किया गया था।