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Muslim Women Mosque Entry Debate: सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई, पर्सनल लॉ बोर्ड बोला- महिलाओं के प्रवेश पर रोक नहीं

धार्मिक स्थलों में महिलाओं के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश का मुद्दा भी उठा। नौ जजों की संविधान पीठ के सामने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से दलील दी गई कि महिलाओं को मस्जिद में नमाज अदा करने से रोका नहीं जाता।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता एम.आर. शमशाद ने कहा कि इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं की ओर से यह मांग रखी गई कि महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश के साथ-साथ अग्रिम पंक्ति में नमाज अदा करने की अनुमति भी दी जाए।

इसी सुनवाई के दौरान सबरीमला मंदिर मामले का भी जिक्र हुआ। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि एक हिंदू किसी भी मंदिर में जा सकता है और धार्मिक स्थलों को संप्रदाय के आधार पर विभाजित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसा अलगाव समाज को कमजोर करता है।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने कांग्रेस नेता शशि थरूर के एक लेख का हवाला दिया। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ज्ञान का स्वागत है, लेकिन “व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी” से प्राप्त जानकारी पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने भी इस बात से सहमति जताई।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई जारी है, जिसमें आगे भी महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलुओं पर फैसला आने की उम्मीद है।

कोर्ट रूम लाइव

एडवोकेट शमशाद: मस्जिद में ‘पवित्रस्थल’ की कोई अवधारणा नहीं है, तो किसी विशेष स्थान पर खड़े होने या नमाज का नेतृत्व करने पर कोई जोर नहीं दे सकता। दरगाहों में पवित्र स्थल होता है।
सीजेआई सूर्यकांत: क्या महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश करने की अनुमति है?
एडवोकेट शमशाद: इस्लाम के सभी संप्रदायों में इस बात पर सर्वसम्मति है कि महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं है। लेकिन इस पर भी सर्वसम्मति है कि नमाज अदा करने वालों में महिलाओं का होना अनिवार्य नहीं है।
जस्टिस अमानुल्लाह: आपको यह स्पष्ट करना चाहिए कि शुरू से ही महिलाओं के मस्जिद प्रवेश पर विवाद नहीं है, यह पैगम्बर मोहम्मद से शुरू हुआ था।
एडवोकेट शमशाद: जी हां, स्वयं पैगंबर ने कहा है कि महिलाओं को मस्जिद आने से मत रोको। लेकिन महिलाओं के लिए उचित यही है कि वो घर पर रहकर प्रार्थना करें, इससे उन्हें उतना ही धार्मिक फल मिलता है।
सीजेआई सूर्यकांत: क्या इसका मतलब यह है कि वह सभा में शामिल नहीं हो सकती?
एडवोकेट शमशाद: यदि वो मस्जिद जा रही हैं तो यह जायज़ है।
जस्टिस नागरत्ना: क्या महिलाओं के लिए मस्जिद की नमाज में शामिल होना अनिवार्य नहीं है?
जस्टिस अमानुल्लाह: तो कारण यह था कि अगर घर के सभी लोग चले जाते हैं, तो बच्चों की देखभाल कौन करेगा?
एडवोकेट शमशाद: महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश की मांग पर आपत्ति नहीं है लेकिन मस्जिद में प्रवेश करने के बाद वहां के आंतरिक नियमों का पालन करना अनिवार्य है। इस्लाम के संदर्भ में अनिवार्य धार्मिक प्रथा (ईआरपी) के सिद्धांत को गलत तरीके से लागू किया है। इस्माइल फारूकी मामले के अदालती फैसले में मस्जिद को इस्लाम के लिए इस आधार पर आवश्यक नहीं माना गया क्योंकि नमाज खुले में भी अदा की जा सकती है। सभी प्रथाएं मस्जिद से जुड़ी हुई हैं। फिर हम अनुच्छेद 25 का क्या करेंगे। एक सिख सेना में दाढ़ी रख सकता है तो मुसलमान इसी वजह से बर्खास्त क्यों?
सीजेआई सूर्यकांत: हम इस बहस में नहीं जाएंगे, सिख धर्म में पुरुष के लिए दाढ़ी रखना पांच अनिवार्य सिद्धांतों में शामिल है।

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